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अनुपम खेर: बंधनमुक्त होने के लिए साहस चाहिए

अनुपम खेर अंतरराष्ट्रीय सिनेमा, और एक प्रेरक वक्ता के रूप में भी पहचान स्कूल रखते हैं। लेकिन करीब 20 साल पहले एक समय ऐसा भी आया था, जब सफलता के शिखर पर चढ़ने के बाद एक कलाकार के रूप में वे थकने लगे थे। हर अभिनेता के कॅरियर में ऐसा समय आता है और यही उसके द्वारा आत्मनिरीक्षण करने का भी समय होता है।

अनुपम खेर ने ऐसा ही किया। उन्होंने औसत दर्जे और मल्टी-स्टार परियोजनाओं पर काम करना छोड़ दिया। उन्होंने व्यर्थ के कार्यक्रमों और फालतू पार्टियों में जाना भी बंद कर दिया। उन्होंने चुनिंदा फिल्में ही करनी शुरू की और चुनिंदा लोगों के साथ ही संपर्क में रहना शुरू किया। उन्होंने अपना ध्यान बड़े सपनों पर लगाया और वे बड़ी जिम्मेदारियों के लिए तैयार हो गए।

इसी दौरान मेरी उनसे मुलाकात हुई थी और मैंने उनमें आए बदलाव को महसूस भी किया। मैंने उनसे पूछा था कि विश्राम के बाद वे कैसा महसूस कर रहे हैं तो वे हमेशा की तरह आशावादी नजर आए। उनका जवाब था, ‘मैं अब वही कर रहा हूं जो मैं करना चाहता हूं। मेरे नाटक ‘कुछ भी हो सकता है’ में एक पंक्ति है, ‘यह मेरे जीवन का अंतराल है।’ यही मेरे लिए वास्तविकता है। हम अभिनेता कॅरिअर के लिए मुंबई आते हैं और इसे जाने बिना चूहा बिल्ली की दौड़ में फंस जाते हैं, क्योंकि इस इंडस्ट्री में आपको आपके द्वारा साइन की जाने वाली फिल्मों की संख्या से आंका जाता है।

बंधनों से मुक्त होने के लिए साहस चाहिए। मैंने वह किया है। अब से मैं अलग-अलग काम करूंगा और अपने तरीके से करूंगा।’

इस सवाल कि अभी आप भारत की तुलना में विदेशों में ज्यादा फिल्में कर रहे हैं। इसमें क्या फर्क है? इसके जवाब में उन्होंने कहा, ‘मैं हमारे यहां के प्रोडक्शन को कम नहीं आंक रहा हूं, लेकिन सच यही है कि हमारी तुलना में वे निश्चित रूप से हमसे अधिक कुशल हैं। वे डिटेलिंग में माहिर हैं, इसलिए भूलों की संभावना कम होती है।

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अब मैं नोट्स बनाता हूं, इसलिए अधिक व्यवस्थित हूं,

कॅरिअर के बुरे दौर ने आपको क्या सिखाया? इस सवाल के जवाब में अनुपम खेर ने कहा, ‘इसने मुझे एकांत सिखाया। मैंने पाया कि हिंदी सिनेमा के लोग अपने-अपने खेमों में काम करते हैं और लोग तभी मिलते हैं, जब वे एक साथ काम कर रहे होते हैं। तो मैंने फैसला किया कि फोकस बदलने का समय आ गया है। इसलिए मैंने अपना नाटक लॉन्च किया, एक पटकथा लिखी और अपना अभिनय स्टूडियो शुरू किया। एक नई दृष्टि एक नए अनुशासन की भी मांग करती है। मैंने नोट्स बनाने की आदत डाली। यश चोपड़ा भी प्लानर का इस्तेमाल करते थे और सैम पित्रोदा अपने मोबाइल फोन पर नोट्स बनाते हैं। मैंने इससे पहले कभी भी लिखित नोट्स पर काम नहीं किया था। अब मैं हर चीज के लिए नोट्स बनाता हूं। इसलिए मैं अधिक व्यवस्थित हूं।’

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